यह समाज ना पुरुष प्रधान, ना स्त्री प्रधान रहा, यह समाज हमेशा ऋषि प्रधान रहा

यह समाज ना पुरुष प्रधान, ना स्त्री प्रधान रहा, यह समाज हमेशा ऋषि प्रधान रहा

लोगो को बरगलाने के लिए मेकोले वचनो का ही उपयोग करते है जैसे भारतीय समाज जाहिल-गंवार था, अंग्रेज़ो ने इसमे कहीं कुप्रथाओं को दूर किया, भारतीय स्त्रियाँ पर्दे मे रहती थी, पति के साथ जबरन जलायी जाती थी, स्त्रियाँ अनपढ़ होती थी वगेरह घिनौने आरोप भारतीय समाज को तोड़नेवाले षडयंत्रकारियों ने जाती, पंथ, भाषा वर्ग, शहरी- ग्रामीण के साथ – साथ स्त्री – पुरुष के नाम पर भी समाज को तोड़ा । भारतीय समाज पर आरोप लगाया की यह समाज पुरुष प्रधान समाज है यहाँ स्त्रियाँ दूसरे दर्जे की है हमारे शास्त्रो पर भी आरोप लगे की उन्होने स्त्री को या तो पुजा की देवी बना दिया या नर्क का द्वार कह दिया उसे मनुष्य का दर्जा नहीं दिया

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हमारी हर परंपरा में वैज्ञानिकता का दर्शन होता हैं अज्ञानता का नहीं

हमारी हर परंपरा में वैज्ञानिकता का दर्शन होता हैं अज्ञानता का नहीं

भारत के पहले काले अंग्रेज़ जवाहरुद्दीन के समय मे विज्ञान के संबंध में यह धारणा व्याप्त कर ली गई थी की पश्चिम का विज्ञान ही श्रेष्ठ है जिन्हे भारत से हटाने के लिए हमें इतनी मेहनत करनी पड़ी और खून बहाना पड़ा या इसलिए ‘पश्चिम जो कहे वही सही’ यह हीन भाव सर्वसाधारण मे बैठा दिया गया था, हमने उनके चिकित्सा ज्ञान (ऐलोपैथी) को राष्ट्र चिकित्सा पद्धति बनाया, ऐलोपैथी को अपने स्वास्थ्य विज्ञान (आयुर्वेद) के आधार पर परखने की बजाय उल्टा काम किया । भारतीय परम्पराओं को पश्चिम के जड़ विज्ञान से नहीं समझा जा सकता था, इसलिए उन्हें दक़ियानूसी, कालबाह्य, गँवारू आदि विशेषणों से मंडित कर त्याग दिया, ‘छोड़ो कल की बाते कल की बात पुरानी’जैसे गाने लोकप्रिय होने …

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सब कंपनियाँ के अनुसार शासन हो रहा है, नेता, अधिकारी कंपनियों के दलाल है

सब कंपनियाँ के अनुसार शासन हो रहा है, नेता, अधिकारी कंपनियों के दलाल है

भारत में लोकतन्त्र की पूरी तरह से हत्या हो चुकी है सभी स्तंभ ढह चुके है लेकिन वे ऐसा ढोंग कर रहे है जैसे कुछ नहीं हुआ इस लोकतन्त्र के शरीर मे कंपनी तंत्र घुस गया है और ये कंपनी-तंत्र जवाहरलाल के समय से शुरू हुआ है काफी दबाव से ईस्ट इंडिया कंपनी को भारत से खदेड़ा लेकिन 126 विदेशी कंपनीया तो 1948 मे थी भारत मे…. ये सब काम नेहरू के दिशा निर्देशो के अनुसार हुआ । इस तंत्र मे कंपनियाँ जो चाहती है वही होता है कंपनियाँ चाहती है लोकतन्त्र का दिखावा करने वाली लच्चर संसदीय प्रणालियाँ, भ्रष्ट नौकरशाही, न्याय की जगह जटिल कानून, उनके घटिया उत्पादोको वैज्ञानिक समर्थन, उनके सनुकूल राष्ट्रिय नीतियाँ, मानसिक गुलामी फैलाने वाली स्कूली …

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वहाँ आविष्कार लूट को ध्यान मे रखकर किए जाते है जबकि आयुर्वेद मे ऐसा नहीं है

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तिब्बती चिकित्सक लगभग 3000 वर्ष पहले दिमाग का ऑपरेशन करते थे लेकिन गर्व की बात है की उनकी इस तकनीक को सिखाने मे भारतियों मे मदद की थी तिब्बती विश्वविध्यालय के प्राचीन त्रिपटीक नाम के विश्व ग्रंथ मे यह जानकारी मिली है इस विश्व कोश के अनुसार भारतियों ने तिब्बती चिकित्सको को मस्तिष्क का ऑपरेशन करने की विद्या सिखाई । इससे यह सिद्ध होता है की हम तकनीक और स्वास्थ्य के मामले मे कितने आगे थे । विश्व स्वास्थ्य संगठन (W.H.O.) की सन १९९७ की रिपोर्ट के अनुसार बाजार में बिक रही ८४ हजार दवाइयों में से ७२ हजार दवाइयों पर तुरंत प्रतिबंध लगना चाहिए, लेकिन प्रतिबंध लगाना तो दूर वर्तमान में इन दवाइयों की संख्या दुगुनी से भी अधिक …

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देश की घड़ी अगर दो घंटे आगे की जाये तो स्वास्थ्य की 60% समस्याओं को समाप्त किया जा सकता है

देश की घड़ी अगर दो घंटे आगे की जाये तो स्वास्थ्य की 60% समस्याओं को समाप्त किया जा सकता है

देश की घड़ी पीछे होने से देश की जनता को स्वस्थ रहने हेतु प्रकृति का सहयोग नहीं मिल रहा है , जिससे स्वस्थ रहना एक बहुत ही महंगा सौदा हो गया है । देश की घड़ी अगर दो घंटे आगे की जाये तो स्वास्थ्य की 60% समस्याओं को समाप्त किया जा सकता है, हमारे देश मे सरकारी कार्यालय 10 बजे प्रारम्भ होते है यदि उनकी जगह सुबह 8 बजे प्रारम्भ होने लगे तो ? निजी कार्यालय 7 बजे खुलेंगे 7 बजे कार्यालय पहुँचने के लिए लोगो को सुबह 4-5 बजे उठाना होगा, यह समय वात का होने से बड़ी आंत और मलाशय सक्रिय होंगे इससे कब्ज की बीमारी नहीं होगी यह समय ब्रह्म मुहूर्त होता है जिसका आध्यात्म की दृष्ठि …

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कलाकार,वेश्याओं गद्दारो और चोरो में अंतर नहीं रहा, सब मिलबांट कर ‘जीम’ रहे है

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अंग्रेज़ो ने एक ऐसे इंडिया का निर्माण किया जो भारत से घृणा करता है – जिसके लिए भारत की हर बात अंधविश्वास, अवैज्ञानिकता, दक़ियानूसी सोच और पिछड़ेपन का प्रतीक है, जो इतनी अधिक हीन भावना से ग्रस्त है की उसके लिए अमेरिका, यूरोप स्वर्ग है, वहाँ की हर सोच प्रगति की निशानी वहाँ की औरतों के नंगेपन मे उसे नारी के स्वातंत्र्य का दर्शन होता है, वहाँ की अवैज्ञानिक भाषा उसे विश्वभाषा दिखाई देती है, वहाँ का अज्ञान उसकी दृष्ठि मे विज्ञान है उनकी क्रूरता मे उसके साहस और उसकी कायरता मे अहिंसा का दर्शन होता है, टेलेंट कंपनियों की प्रगति के लिए ? लूट से एकत्रित संपत्ति की और न देख वह उसे एक विकसित राष्ट्र कहता है, जाते …

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